किस बात का डर है मुझको शायद उम्र का डर, कि बड़े होने का मतलब, बहुत कुछ खोना है, बचपन एक याद है, ना अब उसका साथ होना है। जो साथी थे मेरे बचपन के, कुछ खो गए, कुछ खो जाने हैं, अब तो बाग़ में भी जाने से मन बहलता नहीं, फूलों से भी मुझे अब डर लगता है।
यह कविता मृत्यु के भय की नहीं, बल्कि उस धीरे-धीरे खो जाने वाले सौंदर्य की बात करती है जो जीवन को कभी पूर्ण बनाता था। बड़े होने की प्रक्रिया यहाँ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि मासूमियत, रिश्तों और अर्थ के क्रमिक क्षय के रूप में उभरती है। बचपन के साथी केवल दोस्त नहीं, बल्कि माता-पिता, दादा-दादी और वे सभी हैं जिन्होंने उस संसार को गर्मजोशी से भरा था। कुछ अब खो चुके हैं, और कुछ खो जाने वाले हैं - यही एहसास हर ख़ुशी को नाज़ुक बना देता है।
पंक्ति “फूलों से भी मुझे डर हो लगता है” इस भाव को गहराई से समेटती है। जो फूल कभी खेल और सुंदरता के प्रतीक थे, अब वे अस्थिरता और नश्वरता की याद दिलाते हैं - उन माला के फूलों की, जो अंत समय में अर्पित किए जाते हैं, फूल बीनने की उस रस्म की, जब राख बीनी जाती हैं।
यह कविता समय के लिए एक शोकगीत है - उस हँसी के लिए जो लौटकर नहीं आती, उन यादों के लिए जो बोझिल हो जाती हैं, और उस डर के लिए कि हर खिलता फूल एक दिन मुरझाएगा।

